बालूमाथ (लातेहार)। झारखंड प्रदूषण नियंत्रण पर्षद द्वारा एनएलसी इंडिया लिमिटेड को आवंटित नॉर्थ धाधू (वेस्ट पार्ट) कोल परियोजना के लिए आयोजित पर्यावरण जनसुनवाई अधूरी रही. विरोध के नाम पर तथाकथित ग्रामीणों ने बालूमाथ प्रखंड सह अंचल परिसर में पर्यावरण जनसुनवाई के लिए निर्मित अस्थाई पंडाल को हाईजैक कर लिया. जिससे झारखंड प्रदूषण नियंत्रण पर्षद समेत जिला प्रशासन द्वारा नामित पदाधिकारियों का प्रवेश निर्धारित कार्यक्रम स्थल पर नहीं हो सका. काफी प्रयास के बाद भी जब पर्यावरणीय जनसुनवाई शुरू नहीं हो सकी तो जिला भू अर्जन पदाधिकारी प्रभात कुमार ने कार्रवाई को स्थगित किए जाने की घोषणा की. एनएलसी इंडिया लिमिटेड सीजीएम अभय भगत ने बताया कि अगले 42 वर्षों में उक्त परियोजना से 4.5 मिलियन टन प्रति वर्ष कोयला उत्पादन किए जाने का लक्ष्य निर्धारित है. जिसमें बालूमाथ प्रखंड के हेमपुर, भैंसादोंन, सेमरसोत, धाधू, चित्तरपुर, नवाडीह कुल छह गांव के 754.54 हेक्टेयर भूमि का उपयोग खनन कार्य के लिए किया जाना है. उक्त परियोजना से प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष रुप से लगभग तीन हजार लोगों को रोजगार उपलब्ध कराए जाने का लक्ष्य है. कंपनी अपने सामाजिक दायित्व का बखूबी निर्वहन कर रही है. ================== एनएलसी इंडिया लिमिटेड की नॉर्थ धाधू वेस्ट पार्ट कोल परियोजना के लिए गुरुवार को आयोजित पर्यावरण जनसुनवाई पूरी तरीके से विरोध के नाम पर इकट्ठा हुए तथाकथित ग्रामीणों के द्वारा हाईजैक कर ली गई थी. अधिकतर लोग परियोजना के प्रभावित गांव से इतर दूसरे गांव गेरेंजा, विशुनपुर, मारांगलोइया के लोग शामिल हुए थे. जबकि परियोजना प्रभावित गांव हेमपुर, भैंसादोंन, सेमरसोत, धाधू, चित्तरपुर, नवाडीह के ग्रामीणों की संख्या बहुत कम थी. विरोध के नाम पर इकट्ठा हुए लोग नेतृत्वहीन थे. जिनके द्वारा लोगों के साथ खुलेआम दुर्व्यवहार किया जा रहा था. यही नहीं समाचार संकलन के लिए पहुंचे पत्रकारों के साथ भी उक्त भीड़ के द्वारा दुर्व्यवहार किया गया, जिससे पत्रकारों में भारी नाराजगी है. यही नहीं प्रखंड परिसर के आगमन द्वार व पंडाल के दोनों द्वार को जबरन अवरुद्ध कर दिया गया था, जिससे सरकारी कर्मचारियों को भी अपने कार्यालय जाने में काफी कठिनाइयों का सामना करना पड़ा. जनसुनवाई के लिए जिला प्रशासन द्वारा प्रतिनियुक्त जिला भू अर्जन पदाधिकारी प्रभात कुमार को भी विरोध के नाम पर इकट्ठा हुई भीड़ के द्वारा पंडाल में जाने से रोक दिया गया. मौके पर तैनात किए गए स्वास्थकर्मियों को भी भीड़ ने अपने कर्तव्यों के निर्वहन करने से रोका. ऐसे में सवाल यह उठता है, कि लोकतंत्र में संवैधानिक तरीके से विरोध का अधिकार भारत के हर नागरिक को समान रूप से है लेकिन विरोध के नाम पर खुले आम गुंडई, दुर्व्यवहार व अपनी मनमानी करने का अधिकार विरोध के नाम पर इकट्ठा हुए लोग को किसने दे दिया? जिन लोगों ने भीड़ को विरोध के लिए लेकर आए थे, क्या उनकी कोई जवाबदेही नहीं थी? या उपद्रव करना ही भीड़ व भीड़ लेकर आने वालों का मकसद था?