उमेश यादव लातेहार। आज के डिजिटल दौर में हर हाथ में मोबाइल और हर घर में टेलीविजन आम बात है, लेकिन 2000 से 2010 के बीच गारू प्रखंड के गाँवों की तस्वीर बिल्कुल अलग थी. आधुनिकता की रोशनी यहाँ तक नहीं पहुँची थी. न मोबाइल नेटवर्क था, न बिजली, और न ही संचार के साधन. लोगों कोई नेटवर्क सर्च करने के लिए पहाड़ो में जाना पड़ता था. गाँव के लोग एक-दूसरे से मिलने के लिए लंबी दूरी तय करते थे, और सबसे दिलचस्प बात यह थी कि यहाँ आग भी उधार ली जाती थी.
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जब आग भी उधार थी
उस समय गाँवों में हर घर में माचिस नहीं होती थी. यदि किसी का चूल्हा बुझ जाता, तो उसे जलाने के लिए पड़ोस के घर से जलती हुई लकड़ी लाई जाती थी. लोग एक-दूसरे की मदद से अपना खाना बनाते थे, और यह परंपरा इतनी सामान्य थी कि इसे असुविधा नहीं, बल्कि आपसी सहयोग का हिस्सा माना जाता था.
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सार्वजनिक टेलीविजन और सिनेमा का जादू
गाँव में मनोरंजन के साधन बहुत सीमित थे. जब लोगों को सिनेमा देखना होता, तो वे किराये पर टेलीविजन और डीवीडी प्लेयर लाते थे. गाँव की किसी सार्वजनिक जगह, जैसे चौपाल या किसी बड़े घर के आंगन में, टीवी रखा जाता और सभी लोग एक साथ बैठकर फिल्में देखते थे. यह किसी मेले से कम नहीं होता था. लोग चटाइयाँ और लकड़ी की चौकियाँ (पिढ़ा) लेकर आते और रातभर फिल्में देखी जाती थीं. बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक, हर किसी के लिए यह एक बड़ा आयोजन होता था.
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चकवड़ और मौना का स्वाद, जो अब गुम हो गया
इसके अलावा, गाँव के खान-पान में भी खासियत थी. लोग जंगलों और खेतों में उगने वाली प्राकृतिक सब्जियों का सेवन करते थे, जिनमें चकवड़ और मौना का साग खास था. ये हरी सब्जियाँ पोषण से भरपूर थीं और गाँव के लोगों के भोजन का अहम हिस्सा थीं. लेकिन जैसे-जैसे समय बदला, खेतों और जंगलों की स्थिति भी बदली. अब ये पारंपरिक साग धीरे-धीरे विलुप्त हो रहे हैं, और नई पीढ़ी इनके स्वाद से अनजान होती जा रही है.
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आधुनिकता की ओर कदम
2010 के बाद धीरे-धीरे गाँवों में बदलाव आने लगा. 2014 में बारेसांढ़ थाना बनाया गया और सरयू एक नया प्रखंड बनकर सामने आया. मोबाइल नेटवर्क की पहुँच हुई, पक्की सड़कों का निर्माण हुआ, और मनोरंजन के साधन घर-घर तक पहुँच गए. अब गाँवों में टीवी किराये पर लाने की जरूरत नहीं पड़ती, और लोग मोबाइल पर ही फिल्में देख लेते हैं. लेकिन वे दिन जब पूरा गाँव एक साथ बैठकर सिनेमा देखता था, आज भी लोगों की यादों में ताजा हैं.
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गारू प्रखंड कार्यालय में 1990 से कार्यरत कांति कुमारी बताती हैं, “हमारे समय में गाँव का जीवन पूरी तरह आपसी सहयोग पर आधारित था. तब प्रखंड कार्यालय में लोगों की आवाजाही कम होती थी, बल्कि कर्मियों को ही गाँव-गाँव जाकर कार्य करना पड़ता था. उस समय गाँव के लोग गेठी और चकवड़ साग जैसी पारंपरिक व प्राकृतिक चीजें खाते थे, जो पोषण से भरपूर थीं. अब भी मैं यहीं कार्यरत हूँ, लेकिन गाँव की पुरानी संस्कृति और कई पारंपरिक चीजें धीरे-धीरे विलुप्त होती जा रही हैं.