महुआडांड़ ( लातेहार)। प्राकृतिक सौंदर्य और मनमोहक सूर्यास्त के लिए देश-दुनिया में प्रसिद्ध नेतरहाट के नीचे आज भी कई गांव विकास की मूलभूत सुविधाओं से कोसों दूर हैं। नेतरहाट के प्रसिद्ध मैग्नोलिया पॉइंट से महज दो किलोमीटर नीचे पहाड़ों के बीच बसे महुआडांड़ प्रखंड अंतर्गत पंचायत नेतरहाट के आधे और कोरगी गांव आज भी सड़क, बिजली, पेयजल, स्वास्थ्य और शिक्षा जैसी बुनियादी सुविधाओं के लिए संघर्ष कर रहे हैं।
जहां एक ओर नेतरहाट में प्रतिदिन सैकड़ों पर्यटक प्राकृतिक सौंदर्य का आनंद लेने पहुंचते हैं, वहीं दूसरी ओर नीचे बसे बिरजिया आदिम जनजाति परिवार अभाव और कठिनाइयों के बीच जीवन गुजारने को मजबूर हैं। गांव तक पहुंचने के लिए आज भी कोई सड़क नहीं है। दुर्गम पहाड़ी रास्तों के कारण यहां वाहन नहीं पहुंच पाते। बिजली की सुविधा नहीं होने से ग्रामीण अंधेरे में जीवन बिताने को विवश हैं, जबकि शुद्ध पेयजल की भी समुचित व्यवस्था नहीं है।
बीमारी में बढ़ जाती है ग्रामीणों की परेशानी
गांव में स्वास्थ्य सुविधाओं का पूरी तरह अभाव है। किसी ग्रामीण की तबीयत बिगड़ने पर मरीज को बहंगी के सहारे करीब आठ किलोमीटर तक कठिन पहाड़ी रास्ते से नीचे दौना दुरूप गांव तक लाया जाता है। इसके बाद ही एम्बुलेंस या अन्य वाहन की सुविधा मिल पाती है। कई बार समय पर इलाज नहीं मिलने से मरीजों की हालत गंभीर हो जाती है। आधे और कोरगी गांव में विलुप्तप्राय आदिम जनजाति बिरजिया समुदाय के लगभग 35 परिवार निवास करते हैं। सरकार आदिम जनजातियों के संरक्षण और उत्थान के बड़े-बड़े दावे करती है, लेकिन इन गांवों की स्थिति उन दावों की हकीकत बयां करती है। अधिकांश परिवार आज भी पेंशन, आवास और अन्य सरकारी योजनाओं के लाभ से वंचित हैं। गांव के सभी घर मिट्टी के बने हैं और लोग मूलभूत सुविधाओं के अभाव में जीवन यापन कर रहे हैं।
नक्सल प्रभावित क्षेत्र होने से वर्षों तक रुका विकास
ग्रामीण बताते हैं कि यह इलाका लंबे समय तक नक्सल प्रभावित रहा। डर और दुर्गमता के कारण सरकारी अधिकारियों की आवाजाही लगभग बंद थी। विकास योजनाएं कागजों तक सीमित रहीं और गांव तक नहीं पहुंच सकीं। अब जबकि क्षेत्र नक्सल मुक्त हो चुका है, तब भी दुर्गम रास्ते विकास में सबसे बड़ी बाधा बने हुए हैं। गांव के बुजुर्ग बताते हैं कि पूर्व उपायुक्त के.के. सोन अपने कार्यकाल के दौरान पैदल चलकर गांव पहुंचे थे और ग्रामीणों की समस्याएं सुनी थीं। इसके बाद वर्षों बीत गए, लेकिन कोई बड़ा अधिकारी गांव की सुध लेने नहीं पहुंचा।
शिक्षा भी पहाड़ जैसी चुनौती
गांव में शिक्षा व्यवस्था भी संघर्ष के सहारे चल रही है। पहले दुर्गम रास्तों के कारण शिक्षक नियमित विद्यालय नहीं पहुंचते थे और पढ़ाई भाड़े के शिक्षकों के भरोसे चलती थी। हालांकि अब कुछ शिक्षक नियमित पहुंचने लगे हैं, लेकिन बेहतर शिक्षा के लिए बच्चों को दुरूप गांव जाना पड़ता है। छोटे-छोटे बच्चे रोज कठिन पहाड़ी रास्तों से होकर विद्यालय पहुंचते हैं। विद्यालय जाने में करीब एक घंटा और वापस लौटने में दो घंटे तक का समय लग जाता है।ग्राम आधे निवासी अरुण बिरजिया बताते हैं कि गांव में रोजगार का कोई साधन नहीं है। मजबूरी में अधिकांश युवक दूसरे राज्यों में पलायन कर मजदूरी करने चले जाते हैं।
ग्रामीणों की प्रशासन से मार्मिक अपील
आधे और कोरगी गांव के ग्रामीणों ने सरकार, जिला प्रशासन और जनप्रतिनिधियों से गांव पहुंचकर वास्तविक स्थिति देखने की अपील की है। ग्रामीणों का कहना है कि उन्हें किसी विशेष सुविधा की नहीं, बल्कि इंसान की तरह जीने लायक बुनियादी अधिकारों की जरूरत है।ग्रामीणों ने मांग की है कि गांव तक सड़क बनाई जाए, बिजली पहुंचाई जाए, पेयजल और स्वास्थ्य सुविधाएं उपलब्ध कराई जाएं तथा आदिम जनजाति परिवारों को सरकारी योजनाओं का लाभ दिया जाए।
ग्रामीणों का कहना है कि यदि विश्व प्रसिद्ध पर्यटन स्थल नेतरहाट के नीचे बसे गांव आज भी विकास से वंचित हैं, तो यह व्यवस्था और प्रशासनिक उदासीनता पर बड़ा सवाल है। अब समय आ गया है कि पहाड़ों के नीचे दबे इन गांवों के दर्द को सुना जाए और विकास की रोशनी यहां तक भी पहुंचे।