बालूमाथ (लातेहार)। प्रकृति का पर्व करम बालूमाथ प्रखंड के विभिन्न गावों तथा कस्बों में धूमधाम से मनाया गया. करम पूजा का विशेष महत्व भाई-बहन के रिश्ते में प्यार और स्नेह को बढ़ाना है. करम डाली का वृहस्पतिवार को विसर्जन किया गया. करमा और धरमा इस त्योहार के मुख्य देवता होते हैं, जिनके प्रति श्रद्धा और आस्था प्रकट की जाती है. पर्व पर्यावरण संरक्षण,भाईचारे और सांस्कृतिक धरोहर का संदेश देता है. आधुनिक समय में भी इसकी प्रासंगिकता बनी हुई है. करमा को झारखंड का दूसरा सबसे बड़ा प्रकृति पर्व माना जाता है, जिसे आदिवासी और सदान मिल-जुलकर सदियों से मनाते आ रहे हैं. यह पर्व सदाचार,परंपरा और सामाजिक एकता का प्रतीक है. ऐसी मान्यता है कि इस दिन बहनें अपने भाइयों की दीर्घायु और मंगलमय भविष्य की कामना करती हैं. इस दौरान आदिवासी समाज अच्छे फसल की कामना करता है. बहनें अपने भाइयों की सलामती के लिए प्रार्थना करती हैं. करमा पर्व के दिन बहनें व्रत रखती हैं. रंग-बिरंगे नए वस्त्र पहनकर साज-शृंगार आभूषण पहनती हैं. जावा डाली को भी कच्चे धागे में गूंथे फूलों की माला से सजाया जाता है. इस दिन महिलाएं पूजा स्थल पर करमैती करम के पत्ते पर खीरा रखकर पांच बार काजल और सिंदूर का टीका लगाती हैं, फिर उस पर अरवा चावलों का चूर्ण डालकर खीरे को गोल-गोल टुकड़ों में काटकर करम वृक्ष की शाखा में जगह-जगह पिरोया जाता है. खीरा पुत्र का प्रतीक माना जाता है. इसलिए खीरे को करम देव को समर्पित कर महिलाएं स्वस्थ पुत्र की कामना करती हैं.