कमरूल आरफी लातेहार। साहिल के सुकूँ से किसे इंकार है, लेकिन तूफ़ान से लड़ने में मज़ा ही कुछ और है. आल-ए-अहमद-सुरूर की इन पंक्तियों को वास्तव में आत्मसात किया है एक सखुआ के पेड़ ने. जो राष्ट्रीय राजमार्ग चतरा-रांची सड़क पर बालूमाथ शहर प्रवेश करने से ठीक पहले अवस्थित है. लगभग साल भर पहले एक मालवाहक ट्रक के चपेट में आने से जड़ से उखड़ चुके इस वन्य जीव को लगभग खत्म ही मान लिया गया था. लेकिन धरती से मिले सहारे ने फिर से इस पेड़ में जान डाल दिया है. पेड़ की पत्ते तो सियाह हो कर झड़ ही चुके थे. शाखें भी लगभग सूख कर निढाल हो चुकी थी. लेकिन जैसा इंसानों के बारे में कहा जाता है कि जबतक सांस है तबतक आस है.
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यह कहावत इस पेड़ पर बिल्कुल फिट बैठती है. बिल्कुल जड़ से उखड़ से चुके इस पेड़ में फिर से पत्तियां लहलहा उठी हैं. शाखें फिर से अपना आकार ले रही हैं. उखड़ चुकी जड़ें फिर से धरती से अपना लगाव स्थापित कर रही हैं. और सबसे बड़ी बात यह है कि इसमें किसी की रत्ती भर मदद भी शामिल-ए-हाल नहीं है. तमाम प्रक्रियाएं प्राकृतिक हैं. संदेश बहुत स्पष्ट है कि खामोश लहू भी जोश-ओ-रवानी देगा, साहिल भी समन्दर की कहानी देगा, अगर ठान लो जिंदगी में कुछ करने की, पत्थर को भी निचोडोगे तो पानी देगा. यह पेड़ उन लोगों के लिए प्रेरणा भी है, जो थोड़ी सी संघर्ष वाले समय में अपना धैर्य खोने लगते हैं.