स्कूली बच्चों की आवाजाही और मवेशियों के चरने वाले स्थान पर बिखरी मिलीं सरकारी दवाएं, जांच कर जिम्मेदारी तय करने की मांग
बरवाडीह (लातेहार)। सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं के तहत लोगों को बीमारियों से बचाने के लिए उपलब्ध कराई जाने वाली दवाएं यदि खुले में लावारिस हालत में पड़ी मिलें, तो यह व्यवस्था की गंभीर खामी को उजागर करता है. बरवाडीह के पुराने अस्पताल परिसर के सामने एक बार फिर फाइलेरिया से बचाव में इस्तेमाल होने वाली डाइएथिलकार्बामाजीन साइट्रेट (DEC) 100 एमजी की गोलियां बिखरी मिली हैं. इस घटना ने सरकारी दवाओं के रखरखाव, वितरण और सुरक्षित निस्तारण की व्यवस्था पर सवाल खड़े कर दिए हैं. हैरानी की बात यह है कि जिस स्थान पर गोलियां पड़ी मिली हैं, वहां से स्कूली बच्चों का नियमित आवागमन होता है. आसपास मवेशी भी चरते हैं. ऐसे में खुले में पड़ी दवाएं लोगों और पशुओं की पहुंच में आने की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता. हालांकि, दवाएं वहां किसने रखीं या फेंकीं और वे किस सरकारी केंद्र से संबंधित हैं, इसकी जानकारी अभी स्पष्ट नहीं हो पाई है।
दवाएं खुले में पहुंचीं कैसे?
सरकारी दवाओं की खरीद और वितरण पर सार्वजनिक धन खर्च किया जाता है, ताकि जरूरतमंदों को समय पर उपचार मिल सके. इसके लिए दवाओं का उचित भंडारण, वितरण का रिकॉर्ड और अनुपयोगी या एक्सपायरी दवाओं के सुरक्षित निस्तारण की व्यवस्था जरूरी है. ऐसे में अस्पताल के सामने दवाओं का बिखरा मिलना कई सवाल खड़े करता है. क्या दवाओं के स्टॉक का नियमित मिलान किया जाता है? क्या संबंधित स्वास्थ्यकर्मियों को इसकी जानकारी थी? यदि दवाएं अनुपयोगी हो चुकी थीं, तो उन्हें निर्धारित प्रक्रिया के तहत नष्ट करने के बजाय खुले में क्यों छोड़ा गया?
फार्मासिस्ट की भूमिका को लेकर भी चर्चा
इस मामले के बीच बरवाडीह में फार्मासिस्ट आलोक तिवारी की लंबे समय से पदस्थापना को लेकर भी स्थानीय स्तर पर चर्चा हो रही है. जानकारी के अनुसार, तत्कालीन उपायुक्त उत्कर्ष गुप्ता ने पूर्व में उन्हें हटाने का निर्देश दिया था. बताया जाता है कि वह करीब 18 वर्षों से बरवाडीह में कार्यरत हैं. हालांकि, पूर्व के निर्देश की वर्तमान स्थिति और इस घटना में उनकी किसी भी प्रकार की भूमिका की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है. इसलिए पूरे मामले की निष्पक्ष जांच के बाद ही किसी की जिम्मेदारी तय की जानी चाहिए.
तत्काल हटाई जाएं दवाएं, हो पूरे मामले की जांच
पुराने अस्पताल के सामने खुले में पड़ी गोलियों को तत्काल सुरक्षित स्थान पर हटाना जरूरी है, ताकि बच्चे या मवेशी उनके संपर्क में न आएं. इसके साथ ही स्वास्थ्य विभाग को दवाओं के बैच, उपलब्ध स्टॉक, वितरण रजिस्टर और निस्तारण से जुड़े रिकॉर्ड की जांच करनी चाहिए. जांच में लापरवाही सामने आने पर संबंधित जिम्मेदारों के खिलाफ नियमानुसार कार्रवाई की जानी चाहिए. अब देखना यह है कि स्वास्थ्य विभाग इस मामले को गंभीरता से लेकर केवल दवाओं को हटाने तक सीमित रहता है या फिर यह भी पता लगाता है कि सरकारी दवाएं खुले में पहुंचीं कैसे और इसके लिए जिम्मेदार कौन है.