लातेहार। जिले के महुआडांड़ प्रखंड के सुदूरवर्ती क्षेत्र स्थित राजकीय प्राथमिक विद्यालय मौनाडीह में सरकारी योजनाओं के संचालन में गंभीर लापरवाही का मामला सामने आया हैं. ग्रामीणों की शिकायत पर की गई पड़ताल में कई ऐसे तथ्य सामने आए हैं, जो चौकाने वाले हैं. विद्यालय में नामांकन, छात्र उपस्थिति, मध्यान्ह भोजन (एमडीएम) और सरकारी संसाधनों के उपयोग की निष्पक्ष जांच की मांग अब जोर पकड़ रही है. ग्रामीणों का आरोप है कि विद्यालय में कक्षा एक से आठ तक कुल 25 छात्र-छात्राओं का नामांकन दर्शाया गया है. विभागीय रजिस्टर में इन बच्चों की नियमित उपस्थिति भी दर्ज की जाती है. इसी नामांकन के आधार पर मध्याह्न भोजन, ड्रेस, पाठ्यपुस्तक और कॉपी-किताब सहित सरकार द्वारा उपलब्ध कराई जाने वाली विभिन्न सुविधाओं का लाभ दर्ज किया जाता है. पड़ताल में पता चला कि लंबे समय से विद्यालय में पढ़ाई के लिए बच्चे पहुंच ही नहीं रहे हैं. शिकायत की जांच के दौरान विद्यालय का मुख्य द्वार खुला मिला, लेकिन कक्षाओं में एक भी छात्र मौजूद नहीं था. विद्यालय के शिक्षक भी परिसर में नहीं मिले. बाद में जानकारी मिली कि शिक्षक जंगल की ओर डोरी एवं पुट्टू खुखड़ी चुनने गए हैं. शिक्षक के लौटने पर जब बच्चों की अनुपस्थिति के संबंध में पूछताछ की गई तो उन्होंने स्वीकार किया कि उस दिन कोई भी छात्र विद्यालय नहीं आया था. एक दिन पूर्व भी विद्यालय में जांच के दौरान एक भी बच्चा उपस्थित नहीं था. हैरानी की बात यह रही कि विद्यालय के दैनिक उपस्थिति रजिस्टर में पिछले दिन सभी 25 छात्रों की उपस्थिति दर्ज पाई गई. इस संबंध में पूछे जाने पर शिक्षक ने बताया कि विभाग द्वारा एसएमएस के माध्यम से छात्र संख्या की जानकारी मांगी गई थी,. इसलिए 25 विद्यार्थियों की संख्या भेजी गई और उसी आधार पर उपस्थिति दर्ज कर दी गई. पूछताछ के दौरान शिक्षक ने अपनी नाराजगी भी जाहिर की. उनका कहना था कि उन्हें ऐसे निर्जन क्षेत्र के विद्यालय में पदस्थापित किया गया है, जहां पढ़ाई से अधिक अन्य सरकारी कार्यों का बोझ रहता है. उन्होंने यहां तक कह दिया कि “आप लोगों को जो शिकायत करनी है कीजिए, मैं खुद चाहता हूं कि मुझे निलंबित कर दिया जाए. शिक्षक का काम पढ़ाना है, लेकिन सरकार की ओर से इतने अन्य कार्य दे दिए जाते हैं कि मूल दायित्व प्रभावित हो जाता है. इधर ग्रामीणों का कहना है कि विद्यालय में शिक्षण कार्य की लगातार उपेक्षा और अनियमितता के कारण अभिभावकों का विश्वास समाप्त हो चुका है. यही वजह है कि मौनाडीह के अधिकांश बच्चे गांव से लगभग चार किलोमीटर दूर स्थित राजकीय मध्य विद्यालय बांसकरचा अथवा अन्य विद्यालयों में जाकर पढ़ाई करने को मजबूर हैं. जांच के दौरान विद्यालय की अव्यवस्था भी साफ दिखाई दी. बच्चों के अध्ययन कक्ष में जंगल से लाकर रखा गया सामान और सुखाई जा रही डोरी देखी गई, जिससे विद्यालय परिसर के उपयोग को लेकर भी सवाल उठने लगे हैं. मामले की सच्चाई जानने के लिए राजकीय मध्य विद्यालय बांसकरचा में भी कुछ विद्यार्थियों की उपस्थिति की जांच की गई. वहां पढ़ रहे बच्चों ने बताया कि वे पहले मौनाडीह विद्यालय में पढ़ते थे, लेकिन वहां नियमित पढ़ाई नहीं होने और शिक्षण व्यवस्था कमजोर रहने के कारण उनके अभिभावकों ने उन्हें दूसरे विद्यालय में नामांकित करा दिया. सबसे गंभीर पहलू यह है कि जिन बच्चों का नाम मौनाडीह विद्यालय के नामांकन रजिस्टर में दर्ज है, उनमें से कई बच्चे वर्तमान में राजकीय मध्य विद्यालय बांसकरचा में अध्ययनरत पाए गए जिनका नामांकन भी किया गया है. यदि एक ही छात्र का नाम दो अलग-अलग सरकारी विद्यालयों के रजिस्टर में दर्ज है, तो यह मामला केवल शैक्षणिक अनियमितता तक सीमित नहीं रह जाता, बल्कि सरकारी योजनाओं और संसाधनों के उपयोग पर भी गंभीर प्रश्न खड़े करता है. इससे यह आशंका बढ़ रही है कि विद्यार्थियों की वास्तविक संख्या और कागजी अभिलेखों के बीच बड़ा अंतर मौजूद है, जो कि सरकारी संसाधनों की हेरा फेरी और लूट की ओर इशारा कर रहा है. ग्रामीणों ने पूरे मामले की उच्चस्तरीय जांच कराने, विद्यालय की वास्तविक छात्र संख्या का सत्यापन करने, मध्यान्ह भोजन एवं अन्य सरकारी योजनाओं की जांच कराने तथा दोषी पाए जाने वालों के विरुद्ध कठोर कार्रवाई की मांग की है.