बालूमाथ (लातेहार)। बालूमाथ अंचल अधिकारी बालेश्वर राम को प्रस्तावित तेनुघाट विधुत निगम लिमिटेड की रजबार ई एण्ड डी कोल ब्लॉक को कोयला खनन के लिए बालूमाथ थाना अंतर्गत रजबार के गैरमजूरवा आम व खास भूमि को कोयला खनन हेतू बंदोबस्ती से संबंधित शुरू की गई प्रक्रिया के विरोध में सोमवार को रजवार के ग्राम प्रधान बिंदेश्वर उरांव ने ज्ञापन सौंपा है. ज्ञापन में इस संदर्भ में अंचल अधिकारी के द्वारा शुरू की गई प्रक्रिया को लेकर रजबार में ग्रामसभा की बैठक कर सर्वसमिति से सर्वसधारण गैरमंजरूवा आम व खास भूमि सार्वजनिक भूमी एवं धार्मिक धरोहर से जुड़ी हुई है. जिसमें सरना, मसना, रास्ता, देवस्थल इत्यादि है. इसलिए कोयला खनन के लिए भूमी लीज व बन्दोबस्ती की ग्राम सभा अनुमति नही देने के निर्णय से अवगत कराया गया है. ग्राम प्रधान ने इस संबंध में भूमि अधिग्रहण अधिनियम के पैराग्राफ 5(1) की अनिवार्यता भूमि अधिग्रहण अधिनियम, 2013 इस अनुसूचित क्षेत्र में लागू नहीं होता है. क्योंकि राज्यपाल अथवा राष्ट्रपति के द्वारा हमारे विद्यमान कानूनों पर इसके अधिकार को विस्तारित करने वाली कोई सार्वजनिक अधिसूचना जारी नहीं की गई है. ज्ञापन में अनुच्छेद 19(5) का संरक्षण हमारे पैतृक भूमि पर अधिकार बनाए रखने और उसका उपभोग करने का मौलिक अधिकार अनुच्छेद 19 (5) के परंतुक द्वारा सुरक्षित बताया गया है. जो यह अनिवार्य करता है कि राज्य को अनुसूचित जनजातियों के हितों की रक्षा की जानी चाहिए. बिना संवैधानिक विस्तार के सार्वजनिक उद्देश्य के लिए बेदखल करने का प्रयास इस मौलिक अधिकार का उल्लंघन है. सीएनटी एक्ट 1908 के धारा 46 के तहत हमारी भूमि अहस्तांतरणीय है. आपके कार्यालय द्वारा जारी किया गया कोई भी अधिग्रहण आदेश प्रारंभ से ही शून्य और कानूनी रूप से अस्तित्वहीन है. ग्राम प्रधान ने भूमि अधिग्रहण की नोटिस जारी करने को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता संवैधानिक रूप से वहां बाधित है जहां यह जनजातीय रीति-रिवाजों और भूमि अधिकारों पर प्रतिकूल प्रभाव डालती है. उन्होंने ज्ञापन में बंगाल रेगुलेशन XIII. 1833 के तहत, पारंपरिक जनजातीय शासन के पक्ष में इस क्षेत्र में सामान्य नियमों को समाप्त कर दिया गया था. अधिग्रहण की कार्यवाही में भाग लेने या भूमि खाली करने के लिए जारी किया गया कोई भी समन या नोटिस एक अवैध अभिव्यक्ति है. जो प्रचलित कानून का उल्लंघन करती है. ग्राम सभा के निर्णय से अंचल अधिकारी को अवगत कराते हुए सभी अधिग्रहण कार्यवाहियों को तत्काल रोकें जाने एवं भूमि और संसाधनों के मामलों में केवल पारंपरिक जनजातीय संस्थानों और सर्वोच्च जनजातीय परिषद के अधिकार को मान्यता दिए जाने की बात कही है.