लातेहार। शहर के व्योवृद्ध व्यवसायी व रंगमच कर्मी रविश्वर साहू उर्फ बिलपत साव (104) पार्थिव शरीर मंगलवार को पंचतत्व में विलिन हो गया. बता दें कि गत रविवार की रात उनका देहांत हो गया था. मंगलवार को उनका अंतिम संस्कार शहर के औरंगा नदी मुक्तिधाम में किया गया. उनके ज्येष्ठ पुत्र भुनेश्वर साहू और कनिष्ठ पुत्र श्याम मूर्ति प्रसाद ने संयुक्त रूप से मुखाग्नि दी.
रविश्वर साहू, फाइल फोटो
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इससे पहले शहर के चट्टी मुहल्ला स्थित आवास से गाजे बाजे के साथ उनकी अंतिम यात्रा निकाली गयी. इसमें बड़ी संख्या में नगर वासियों ने भाग लिया. पूरे रास्ते इस्कॉन मंदिर के अनुयायियों ने हरे कृष्ण- हरे राम का नाम संकीर्तन किया.
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अंतिम संस्कार में निर्मल कुमार महलका, डा विशाल शर्मा, कन्हाई प्रसाद अग्रवाल, विजय प्रसाद गुप्ता, राजेश प्रसाद, शिवपूजन प्रसाद, गोविंद प्रसाद, मुरली मोहन प्रसाद, घनश्याम प्रसाद, श्याम सुंंदर प्रसाद, राकेश सिंह, राकेश कुमार साहू, सुनील प्रसाद, संतोष प्रसाद, संतोष प्रसाद गुप्ता, अशोक प्रसाद, सुरेश प्रसाद, प्रीतम प्रसाद गुप्ता, गौतम प्रसाद गुप्ता, विनोद बिहारी लाल, टेंपो प्रसाद, मंटू प्रसाद समेंत कई लोग शामिल थे.
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रंगमंच के स्थापित कलाकार थे रविश्वर साहू
रविश्वर साव लातेहार के सांस्कृतिक व रंगमंच के विरासतों में एक थे. लातेहार में पहले नाट्य कला संस्था के संस्थापक सदस्यों में शामिल थे. शहर के कलाकारों ने वर्ष 50-60 दशक में एक नाटक मंडली की स्थापना की थी. नाटक मंडली में रविश्वर साहु के अलावा बेचू साव, रामनंदन साव, युगल साव, किरानी सिंह,अक्षेवट साव, रामदास साव, प्रयाग साव, रामेश्वर दास, लखन दास, सूरज प्रसाद, धनेश्वर प्रसाद, भोला शरण, लल्लु सिंह, रामजन्म सिंह, भुनेश्वर साहु, नथुनी ठाकुर, अशोक महलका व मोहन दास आदि शामिल थे.
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इन कलाकारों के द्वारा राजा हरिशचंद्र, सुल्ताना डाकू, रामायण, महाभारत, अंधेर नगरी चौपट राजा आदि नाटकों का मंचन किया गया, जो आज भी उस दौर के लोगों के जेहन में जिंदा है. बाद में जब सिनेमा और आरकेस्ट्रा का दौर आया तो नाटकों का मंचन होना बंद हो गया. इसके अलावा लातेहार में एक गीत संगीत के कलाकारों की टोली थी. उसमें भी रविश्वर साहू शामिल थे.
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यह टोली होली के दिन होलिका दहन के बाद राख ले कर धूल उड़ाते हुए पूरे शहर में ढोल मंजीरे के साथ भ्रमण करती थी और होली की शुभकामनायें देती है. 90 के दशक यह यह सिलसिला जारी रहा. बाद में मंडली के कई सदस्य दिवगंत हो गये, उसके बाद धीरे धीरे यह परंपरा खत्म होती चली गयी.