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मयंक विश्वकर्मा, बरवाडीह
लातेहार। जिले के छिपादोहर को प्रखंड सह अंचल बनाने की मांग अब जोर पकड़ने लगी है. लोग अब इस मांग को ले कर मुखर होने लगे हैं. तभी प्रखंड निर्माण संघर्ष समिति के अध्यक्ष देवनाथ सिंह के नेतृत्व में एक प्रतिनिधिमंडल ने मंगलवार को समाहरणालय पहुंचा और मुख्यमंत्री को संबोधित एक ज्ञापन उपयुक्त, लातेहार को सौंपा. ज्ञापन में केड़, कुचिला, चुंगरू, हरातु, लात और छिपादोहर पंचायत को मिलाकर नया प्रखंड बनाने की मांग की. ज्ञापन में बताया गया है झारखंड राज्य गठन के समय से ही छिपादोहर को प्रखंड बनाने की मांग की जा रही है. लेकिन राज्य गठन के 24 वर्ष बाद भी छिपादोहर को अब तक प्रखंड का दर्जा नहीं मिल सका है. जबकि इसी दौरान राज्य में तीन से पांच पंचायतों को मिलाकर दर्जनों नए प्रखंड बनाए जा चुके हैं. देवनाथ सिंह ने कहा कि लंबे समय से जारी इस मांग को अब तक नजरअंदाज किया जाना दुर्भाग्यपूर्ण है. उन्होंने सरकार से जल्द से जल्द सकारात्मक निर्णय लेने की अपील की है ताकि क्षेत्र के आदिवासी समुदाय को न्याय मिल सके और विकास की राह प्रशस्त हो.
दुर्गम पहाड़ी क्षेत्र व मूलभूत सुविधाओं का घोर अभाव
बता दें कि छिपादोहर दुर्गम पहाड़ी क्षेत्र है. यहां आज भी शिक्षा, स्वास्थ्य, बिजली, सड़क, कृषि विकास जैसी बुनियादी सुविधाओं का घोर अभाव है. ग्रामीण आज भी लकड़ी, पत्ते, और पानी जंगलों से ढोकर गुजारा कर रहे हैं. रोजगार की कमी के कारण यहां के युवा लगातार पलायन को मजबूर हैं. प्रस्तावित छिपादोहर प्रखंड उत्तर-दक्षिण में लगभग 40 किलोमीटर और पूर्व-पश्चिम में लगभग 60 किलोमीटर में फैला हुआ है. यह क्षेत्र पलामू टाइगर रिजर्व जैसे संरक्षित वनक्षेत्र से भी घिरा हुआ है. 85 प्रतिशत से अधिक आबादी आदिवासी समुदाय की है, जो अब तक विकास की मुख्यधारा से कोसों दूर है. वहीं ज्ञापन में यह भी बताया गया है कि प्रस्तावित प्रखंड भवन निर्माण के लिए लगभग 4–5 एकड़ सरकारी भूमि उपलब्ध है. इसका उपयोग प्रशासनिक कार्यों के लिए किया जा सकता है.
माओवादी गतिविधियों से प्रभावित क्षेत्र
ज्ञापन में उल्लेख है कि यह पूरा क्षेत्र एक्शन प्लान-01 एवं एक्शन प्लान-02 के अंतर्गत आता है. लात पंचायत को माओवादियों का शरण स्थली कहा जाता था. बूढ़ा पहाड़, जो कि माओवादियों का प्रमुख प्रशिक्षण केंद्र रहा है, वह लात पंचायत से मात्र 8–9 किलोमीटर की दूरी पर है. चुंगरू और हरातु पंचायतें भी उग्रवाद प्रभावित क्षेत्र में आती हैं और इनके समीप स्थित रानीदह झील को भी माओवादी गतिविधियों का गढ़ माना जाता रहा है.